१९५४ मध्ये लाल किल्ल्यावरून दलितांचा आवाज आक्रमकपणे उठवताना पंडित नेहरू म्हणतात :
आजादी खाली सियासी आजादी नहीं, खाली राजनीतिक आजादी नहीं. स्वराज्य और आज़ादी के माने और भी हैं, सामाजिक और आर्थिक हैं. अगर देश मे कही गरीबी है तो वहा तक आजादी नही पहुँची, यानी उनको आजादी नहीं मिली...
जिससे वे गरीबी के फंदे में फसे है. जो लोग फंदे में होते है, उनके लिए मानो स्वराज्य नहीं होता. वैसे वे गरीबी के फंदे में है. इसी तरह अगर हम आपस के झगड़ों में फंसे हुए है, आपस में बैर है, बीच में दीवारें हैं, हम एक दूसरे से मिलकर नहीं रहते, तब भी हम पूरे तौर से आज़ाद नहीं है....
जो एक दूसरे के खिलाफ हमें जोश चढ़ता है, उससे जाहिर होता है कि हमारे दिल और दिमाग पूरी तौर से आजाद नहीं हुए है, चाहे ऊपर से नक्शा कितना ही बदल जाए. इसी तरह की कई बातों से हमारी तंगख्याली जाहिर होती है. अगर हिंदुस्तान के किसी गांव में किसी हिंदुस्तानी को, चाहे वह किसी भी जाति का है
या अगर उसको हम चमार कहें, हरिजन कहें, अगर उसको खाने पीने में, रहने चलने में वहाँ कोई रुकावट है, तो वह गांव कभी आजाद नहीं है, गिरा हुआ है ।
देश की आजादी आम लोगों के रहन सहन, आम लोगो की तरक्की, आगे बढ़ने के मौके, आम लोगों को क्या तकलीफ और क्या आराम है इन बातों से देखी जाती है...
तो अभी हम आजादी के रास्ते पर है, यह न समझिये की मंजिल पूरी हो गई. और वह मंजिल एक जिंदादिल देश के लिए जो आगे बढ़ती जाती है, कभी पूरी नहीं हुई.'

@rohan_mutha
संदर्भ:
नेहरू: मिथक और सत्य (पीयूष बबेले)
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